भारतीय मुसलमानों की पस्ती का एकमात्र हल — मुस्लिम क़ियादत (नेतृत्व



 भारतीय मुसलमानों की पस्ती का एकमात्र हल — मुस्लिम क़ियादत (नेतृत्व)

लेखक: मोहम्मद साजिद रज़ा क़ादरी रिज़वी

संस्थापक: तहरीक-ए-फ़ैज़ान-ए-लौह-ओ-क़लम, जगन्नाथपुर पोस्ट संकुला, वाया बारसोई, ज़िला कटिहार


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यह बात न तो छुपी हुई है और न ही ढकी हुई कि भारत में मुसलमानों की हालत बेहद नाज़ुक और दयनीय है। आर्थिक, शैक्षिक और राजनीतिक – हर क्षेत्र में मुसलमान पिछड़े हुए हैं। न उनके पास कोई मज़बूत राष्ट्रीय नेता है, न कोई ऐसी मिल्ली (सामुदायिक) क़ियादत (नेतृत्व) जो उन्हें एक प्लेटफॉर्म पर एकजुट रख सके। हर व्यक्ति अपने-अपने तरीके से खुदमुख़्तार है और इसी में खुश है, जबकि हक़ीक़त इसके बिल्कुल उलट है। इस व्यक्तिगत खुदमुख़्तारी ने उन्हें आपस में विभाजित कर दिया है – बाप बेटे से अलग हो गया, भाई भाई से कट गया – और एक-दूसरे के ख़ून के प्यासे बन बैठे हैं। उनकी राजनीतिक हालत उस फुटबॉल की तरह है, जिसे हर कोई अपनी लात मार रहा हो।

जब किस्मत ने देश का बँटवारा किया, तो उसका ठीकरा भी मुसलमानों के सिर फोड़ा गया। बल्कि आज तक वही फोड़ा जा रहा है, जबकि सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। लाला लाजपत राय वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने इस बँटवारे के बीज बोए। लेकिन जब देश बँट ही गया तो जो लोग जाना चाहते थे, चले गए। और जो रह गए उन्होंने अपनी मातृभूमि को छोड़ना गवारा नहीं किया। अब सवाल था — उनकी क़ियादत (नेतृत्व) कौन करेगा?

तो गांधी जी ने यहाँ रहने वाले मुसलमानों की तक़दीर को कांग्रेस से जोड़ दिया। अब उनकी ज़िंदगी और मौत की ज़िम्मेदार यही पार्टी ठहरी। यही वजह है कि मुसलमानों का एक तबक़ा हमेशा से गांधी की “जय” बोलता आया है, और कांग्रेस का ऐसा वफ़ादार बन गया कि आज भी उसकी अंधभक्ति में डूबा हुआ है। उनकी आज़ादी की भावना मर चुकी है, सोचने की ताक़त खत्म हो चुकी है, और ईमानी गैरत और इस्लामी हमियत मफ़क़ूद हो गई है।

मुसलमानों का यह तबक़ा कांग्रेस के हाथों अपने ईमान और इस्लाम को इस कदर गिरवी रख चुका है कि आज भी गांधी या कांग्रेस की आलोचना को अपनी आलोचना समझता है। जो मुसलमान कांग्रेस से अलग अपनी अलग क़ियादत की बात करता है, उसे यह लोग इस्लाम और मुसलमानों का दुश्मन करार देते हैं।

मैं यह बात हवा में नहीं कह रहा, बल्कि हाल ही में साप्ताहिक नई दुनिया (दिल्ली) में छपा एक छोटा-सा लेख पढ़ा, जिसे पढ़कर अफ़सोस हुआ और लेखक की मानसिक दिवालियापन व कांग्रेस की अंधभक्ति पर रोना आया। यकीन न आए तो खुद पढ़िए:

> “नई दुनिया को मालूम होना चाहिए कि ओवैसी इस्लाम और मुसलमानों का दोस्त नहीं, बल्कि दुश्मन है। उसने महाराष्ट्र में कदम रखकर दो सीटें भले जीत ली हों, लेकिन एक दर्जन से ज़्यादा सीटों पर बीजेपी और शिवसेना की जीत का कारण बना। अगर ओवैसी और प्रकाश आंबेडकर की पार्टी मैदान में न होतीं तो कांग्रेस और एनसीपी को ज़्यादा सीटें मिलतीं। नई दुनिया ने ओवैसी की पीठ थपथपा दी, जबकि उसे उसके खिलाफ लिखना चाहिए था।”

देखा आपने — कांग्रेस की हार को अपनी हार कहा गया, बल्कि इस लेखक ने कांग्रेस की हार को इस्लाम और मुसलमानों की हार करार दिया! गोया कांग्रेसियत ही “असली इस्लाम” है!

याद कीजिए — यही कांग्रेस थी जिसने बाबरी मस्जिद में मूर्तियाँ रखवाईं, यही कांग्रेस थी जिसने हाशिमपुरा, भागलपुर, मुज़फ़्फ़रनगर और मेरठ में मुसलमानों का क़त्लेआम करवाया, और फिर भी यही “मुसलमानों की हमदर्द” कहलाती है!

अब सवाल यह उठता है — क्या भारत का मुसलमान कांग्रेस को जिताने का ठेका लिए बैठा है? या बीजेपी को हराने की ज़िम्मेदारी उसी की है? यही कारण है कि जब कांग्रेस अंतिम सांसें गिन रही है, तब भी मुसलमान पाँव की फुटबॉल बना हुआ है।

बीजेपी के मुक़ाबले सपा हारे — मुसलमान ज़िम्मेदार!

बसपा हारे — मुसलमान ज़िम्मेदार!

हर पार्टी बीजेपी के डर से मुसलमानों से वोट मांगती है, और जब हार जाती है तो इल्ज़ाम मुसलमानों पर।

उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजों ने साबित कर दिया कि “मुस्लिम नेतृत्व का डर” हिंदुओं को एकजुट कर देता है, और बीजेपी को फिर सत्ता में ले आता है। लेकिन मुसलमान अपनी खुद की क़ियादत छोड़कर, बीजेपी को हराने के नाम पर सपा, बसपा और कांग्रेस जैसी पार्टियों को वोट देकर “देशभक्ति” निभाता है। इससे यह साफ़ जाहिर है कि मुसलमानों को अपनी कौम पर भरोसा नहीं, जितना कि ग़ैर-मुसलमानों पर है।

अगर यही हाल रहा तो मुसलमान जिस गर्त में गिरे हैं, उससे निकलना नामुमकिन है। और यह तभी मुमकिन होगा जब वे अपनी खुद की क़ियादत (नेतृत्व) पैदा करेंगे — लेकिन अफ़सोस, ऐसा होता नजर नहीं आता।

कुछ “लाल बुझक्कड़” कहते हैं कि जब बाकी पार्टियाँ मुसलमानों को टिकट देकर उन्हें संसद में भेज रही हैं, तो फिर अपनी पार्टी या नेतृत्व की क्या ज़रूरत?

उनसे कहना है — जब शरीअत में दखल दिया जा रहा था, जब मुस्लिम बहनों-बेटियों की इज़्ज़त खतरे में थी — तब ये “मुस्लिम नेता” जो कांग्रेस, सपा या बसपा के जरिए संसद पहुँचे थे, उनमें से कितनों ने इस्लाम की या मुसलमानों की खुलकर हिमायत की? किसी ने नहीं! सबके मुँह में पार्टी का ताला लगा हुआ था।

यही कारण है कि 70 साल में धीरे-धीरे मुसलमानों के अधिकार छीने जाते रहे और हालत यहाँ तक पहुँची कि अब तो अपने अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं।

लेकिन जब अपनी खुद की क़ियादत होगी, तब ही अपने राष्ट्रीय और धार्मिक हक़ों की खुलकर आवाज़ उठेगी।

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